नवरात्रि पांचवां दिन -स्कंदमाता की पूजा विधि

नवरात्रि पांचवां दिन -स्कंदमाता की पूजा विधि skandmata-ki-pooja-vidhi

0 11
नवरात्रि पांचवां दिन -स्कंदमाता की पूजा विधि

नवरात्रि का पांचवा दिन माँ दुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता का है. नवरात्रि की कड़ी में हम स्कंदमाता की कथा, उनका स्वरुप और पूजनविधि लेकर प्रस्तुत हुए हैं. तो आइये जानते हैं  स्कंदमाता की पूजा विधि.

 स्कंदमाता कौन हैं

दुर्गा माँ का यह रूप कार्तिकेय की माँ है. कार्तिकेय देवासुर संग्राम के देवताओं के सेनापति थे. कार्तिकेय का एक नाम स्कन्द भी है इसलिए दुर्गा माँ का यह रूप स्कंदमाता कहलाता है. कार्तिकेय को कुमार, मुरुगन, सुब्रमण्य आदि नामों से भी जाना जाता है. अनेक स्थानों पर स्कंदमाता और उनके पुत्र कार्तिकेय की पूजा साथ में की जाती है. ऐसा कहा जाता है कि स्कंदमाता की पूजा से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं. इसलिए मन को पवित्र रखते हुए एकाग्रभाव से स्कंदमाता की आराधना करके उनकी शरण में जाने का प्रयत्न करना चाहिए.

स्कंदमाता का स्वरुप

स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं. दायीं ओर ऊपर की ओर संकेत किये हुए नीचे वाली भुजा में कमल है. बायीं ओर ऊपर की भुजा में वरमुद्रा और नीचे की भुजा जिसकी दिशा ऊपर की ओर है इसमें भी कमल है. स्कंद माता कमल के आसन पर विराजित हैं इसलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है. कमल के साथ देवी का यह स्वरुप सिंह पर भी विराजमान है इसलिए इनका वाहन सिंह भी है. स्कंदमाता के विग्रह में कार्तिकेय जी बालरूप में उनकी गोद में विराजमान हैं.

स्कंदमाता की उपासना

कहा जाता है कि माता की उपासना से कार्तिकेय देव की उपासना भी हो जाती है. इन देवी की उपासना आलौकिक तेज और कांति प्रदान करने वाली है. इनकी उपासना से समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है और साधक को शान्ति और सुख की प्राप्ति होती है. स्कंदमाता की उपासना से एक मूढ़ व्यक्ति भी ग्यानी हो जाता है. संतान की उत्पत्ति के लिए भी स्कंदमाता की पूजा की जाती है. वात, पित्त, कफ आदि से पीड़ित व्यक्तियों को भी देवी के इस रूप की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से ये रोग पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं.स्कंदमाता की आराधना विशुद्ध चक्र में ध्यान केंद्रित करके की जाती है.

पूजा विधि 

जिस प्रकार आप नवरात्रि में प्रतिदिन कलश पूजन, लौंग अर्पण आदि करते हैं, यह विधि पूर्ण करने के साथ इस श्लोक का उच्चारण करें

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया | शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ||

अब स्कन्द माता को जल, पुष्प आदि अर्पित करें. स्कन्द माता के लिए अलसी का भोग प्रमुख है. तो पूजा में अलसी को अवश्य सम्मिलित करें. देवी के इस रूप को केला अति प्रिय है इसलिए आज के दिन केले का भोग लगाएं. अब बीज मन्त्र का उच्चारण करें जो इस प्रकार है

ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:

अब दुर्गा सप्तशती के अध्यायों और कवच का पाठ करें. इसके पश्चात यदि संभव हो तो पुस्तक में उल्लेखनीय सभी बीज मन्त्रों का उच्चारण करें.

अब स्कंदमाता के मन्त्र 

‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:।’

का एक माला जप करें.

अब माँ की आरती करके क्षमायाचना करें और इस प्रकार पांचवे दिन की पूजा संपन्न हुई. संध्या आरती भी अवश्य करें.

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User