आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध

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आखिर क्यों हुआ महाबली हनुमान और सुदर्शन चक्र में महायुद्ध

जैसा की हम सभी जानते हैं की त्रेता युग में भगवान विष्णु प्रभु श्री राम के रूप में जन्म लिए थे और इस जन्म में महाबली हनुमान उनके सेवक थे। ऐसा माना जाता है की राम भक्त श्री हनुमान चिरंजीवी हैं और पृथ्वी के अंत तक वह यहां मौजूद रहेंगे। परन्तु दर्शकों आज में आपको श्री राम और उनके भक्त हनुमान के कथा की जगह भगवान कृष्ण और महाबली हनुमान जी एक की एक ऐसी कथा के भारे में बताने जा रहा हूँ जिसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।इस एपिसोड में मैं आपको बताऊंगा की आखिर हनुमान जी और श्री कृष्ण के अस्त्र सुदर्शन चक्र के बिच किस बात को लेकर युद्ध हुआ था और उसका परिणाम क्या हुआ।

कथा के अनुसार एक समय सुदर्शन चक्र को अपनी शक्ति पर अहंकार हो गया। वह मन ही मन सोचने लगा की तीनो लोकों में उससे बड़ा कोई कोई भी शक्तिशाली नहीं है। सुदर्शन चक्र  को यह अभिमान हो गया था की भगवान श्री कृष्ण भी अंत में दुष्टों का नाश करने के लिए मेरी ही सहायता लेते हैं। उधर इस बात का ज्ञान जब भगवान् श्री कृष्ण को हुआ तो उन्होंने ने निश्चय किया की किसी भी तरह सुदर्शन चक्र के अहंकार को तोड़ना ही होगा। फिर भगवान श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र के अभिमान तोड़ने के लिए हनुमान जी की सहायता ली और उन्होंने हनुमान जी को याद किया। कहते हैं की दूर रहते हुए भी भक्त और भगवान दोनों एक दूसरे की बात समझ जाते हैं। इसलिए कृष्ण जी के याद्द करते ही हनुमान जी समझ गए की प्रभु उन्हें याद कर रहे हैं। चूँकि हनुमान जी यह जानते थे की उनके प्रभु श्री राम और श्री कृष्ण एक ही हैं इसलिए वो बिना किसी  देरी के द्वारका के लिए निकल पड़े और द्वारका पहुंचकर वो श्री कृष्ण से मिलने दरबार में जाने की बजाय द्वारका के राज उपवन में चले गए।

उपवन पहुंचने पर उन्होंने देखा की वहां के वृक्षों पर बड़े ही मीठे और रसीले फल लगे हुए हैं। हनुमानजी को भूख भी लगी थी इसलिए उनहोंने वृक्षों से फल तोड़कर खाना शुरू कर दिया। और फिर जब उनका पेट भर गया तो वो वृक्षों और उस पर लगे फलों को तोड़कर फेकने लगे।

उधर जब इस बात का पता दरबार में बैठे श्री कृष्ण को पता चला तो वो मन ही मन मुस्कुराने लगे और फिर उन्होंने अपनी सेना को आदेश दिया की जाकर उस वानर को पकड़ लाये। श्री कृष्ण का आदेश पाते ही उनकी सेना हनुमानजी को पकड़ने के लिए राज उपवन के लिए निकल पड़े। वहां पहुंचकर सेना ने हनुमान जी को ललकारा और कहा हे मूर्ख वानर तुम बाग़ क्यों उजार रहे हो। और इस तरह इन फलों को क्यों तोड़ रहे हो। क्या तुम नहीं जानते की यहाँ का राजा कौन है ? अगर नहीं जानते तो मैं तुम्हे बता दूँ की यहाँ के राजा श्री कृष्ण हैं और वो तुम्हे दरबार में बुला रहे हैं।

सेनानायक की बातें सुनकर महाबली हनुमान ने क्रोध होने का ढोंग करते हुए कहा की कौन कृष्ण, मैं किसी कृष्ण को नहीं जनता। मैं तो प्रभु श्री राम का सेवक हूँ। इसलिए जाओ और अपने राजा कृष्ण दो की मैं नहीं आऊंगा। यह सुन सेनानायक क्रोधित हो उठा और हनुमान जी से बोला अगर तुम अपने आप मेरे साथ नहीं चलोगे तो मैं तुम्हे जबरदस्ती पकड़ कर ले जाऊंगा। फिर जैसे ही श्री कृष्ण की सेना हनुमान जी पकड़ने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही हनुमान जी सारी सेना को पूँछ में लपेटकर राजमहल में फेंक दिया।यह देख सेनापति वहां से भाग गया और श्री कृष्ण को दरबार में आकर बताया की वह कोई साधारण वानर नहीं है।

फिर उसने श्री कृष्ण को सारि बातें बताई। उसके बाद श्री कृष्ण ने अपने सेनापति से कहा की आप उस वानर को जाकर कहिये की श्री राम आपको बुला रहे हैं। यह सुन सेनानायक वहां से हनुमान जी के पास चला गया। इधर श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को आदेश दिया की तुम्हे द्वार की रखवाली करनी है और इस बात का भी ध्यान रखना है की कोई भी बिना अनुमति के अंदर ना आ पाए। अगर कोई बिना आज्ञा के अंदर आने का प्रयास करे तो उसका वध कर देना। यह सुन सुदर्शन चक्र द्वार की रखवाली करने लगा। चूँकि श्री कृष्ण ये समझते थे की श्री राम का सन्देश सुनकर हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते हैं।

उधर सेनानायक ने जब हनुमान जी से कहा की श्री राम तुम्हे बुला रहे हैं तो हनुमान जी बिना देर किये दरबार के लिए निकल पड़े और जब दरबार के द्वार पर पहुंचे तो सुदर्शन चक्र ने उन्हें रोकते हुए कहा की मेरी अनुमति के बगैर तुम अंदर नहीं  जा सकते। किन्तु सुदर्शन चक्र यह नहीं जनता था की जब श्री राम बुला रहे हों तब हनुमान जी को तीनो लोकों में कोई नहीं रोक सकता।सुदर्शन की बात सुनकर हनुमान जी ने सुदर्शन से अपना रास्ता छोड़ने के लिए कहा लेकिन सुदर्शन ने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा और फिर दोनों में महाभयंकर युद्ध होने लगा।किन्तु कुछ देर बाद जब हनुमान जी को यह ज्ञात हुआ की  सुदर्शन के साथ युद्ध मे उलझकर मेरा समय बर्बाद हो रहा है तो उन्होंने मन ही मन सोचा की किसी भी तरह इस युद्ध को जल्द ही समाप्त करन होगा।  उसके बाद उन्होंने सुदर्शन को पकड़ कर अपने मुंह में रख लिया।

और फिर वो अंदर दरबार में पहुँच गए। दरवार में पहुंचकर हनुमान जी सबसे पहले श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक हो गए। यह देख श्री कृष्ण जी ने हनुमान को गले से लगा लिया और फिर उनसे पुछा हनुमान तुम अंदर कैसे आये क्या किसी ने तुम्हे रोका नहीं। तब हनुमान जी ने कहा भगवन सुदर्शन ने रोका था। परन्तु मैंने सोचा आपके दर्शनों में ज्यादा विलम्ब ना हो इसलिए मैं उनके साथ युद्ध में नहीं उलझा। और उसे मैंने अपने मुंह में दबा लिया। इतना कहकर हनुमान जी ने अपने मुँह से सुदर्शन चक्र को निकालकर श्री कृष्ण के चरणों में रख दिया। यह देख सुदर्शन चक्र का सर शर्म से झुक गया और इस तरह अब उसका घमंड भी चूर हो चूका था।

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