यदुवंश के नाश की पूरी कहानी

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यदुवंश के नाश की पूरी कहानी

यदुवंश के नाश की पूरी कहानी:

यदुवंश के नाश की पूरी कहानी: दर्शकों ये तो हम सभी जानते हैं की महाभारत युद्ध में कौरवों का सम्पूर्ण नाश हो गया था और पांडव हस्तिनापुर पर राज करने लगे थे। साथ ही ये भी हम सभी जानते हैं की अपने सौ पुत्रों की मृत्यु से व्यथित कौरवों की माता गांधारी ने भगवान श्री कृष्ण को यह शाप दिया था की जिस तरह उन्होंने कौरव वंश का नाश किया है ुअसि तरह एक दिन उनके भी वंश यानि यदुवशियों का भी नाश हो जायेगा। लेकिन दोस्तों क्या आप जानते हैं की महाभारत युद्ध के कितने दिन  के बाद यदुवंशियों का विनाश कैसे और कब हुआ अगर नहीं तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखें। आज की इस वीडियो में हम आपको यदुवश के  विनाश की सम्पूर्ण कथा बताने जा रहे है। तो चलिए अब बिना किसी देरी के इस कथा को शुरू करते हैं।

 

महाभारत के मौसलपर्व में वर्णित कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के पश्चात् जब छतीसवाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ तब द्वारका में कई अपशकुन दिखाई देने लगे। उसी समय एक दिन महर्षि विश्वामित्र,कण्व और देवर्षि नारदजी द्वारका पहुंचे। उधर जब वहां यादव कुल के नवयुवकों को पता चला की कुछ ऋषिगण द्वारका पधारे हैं तो उन्होंने उनके साथ परिहास करने का सोचा। फिर एक दिन यादव कुमारों ने भगवान श्री कृष्ण के पुत्र,साम्ब को स्त्री वेश में विभूषित करके उनके पास ले गए। और फिर उन  महर्षियों को प्रणाम करते हुए कहा हे ऋषिगण यह स्त्री तेजस्वी बभ्रु की पत्नी है। और  बभ्रु के मन में पुत्र की बड़ी लालसा है। आप लोग ऋषि हैं अतः अच्छी तरह सोचकर इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा हम सभी को बताने की कृपा करें। उन यादव कुमारों के ऐसा कहने के बाद ऋषिगण धयान करने लगे और कुछ क्षण पश्चात् जब उन्हें पता चला कि ये कोई स्त्री नहीं बल्कि द्वारकाधीश श्री कृष्ण का पुत्र साम्ब है तो वे सभी क्रोधित हो उठे और फिर  कहा हे मूर्ख बालकों तुम सभी ने हमलोगों को धोखा दिया है तुमलोगों ने हम सभी के साथ छल करने की चेष्टा की है  दुराचारी यादव कुमारों तुम जिसे स्त्री बता रहे हो वह कोई  स्त्री नहीं बल्कि भगवान श्री कृष्ण का पुत्र साम्ब है। तुम लोगों ने हमारा अपमान किया है इसलिए श्री कृष्ण के इस पुत्र के गर्भ से एक भयंकर लोहे का मूसल उत्पन्न होगा जो यदुवंश के विनाश का कारण होगा। उसी से तुमलोग बलराम और श्री कृष्ण के सिवा अपने समस्त कुल का संहार कर डालोगे। ऐसा कहकर वे सभी मुनि भगवान कृष्ण के पास गए और वहां पहुंचकर उन्होंने उनसे सारी बाते कह सुनाई। यह सब सुनकर भगवान मधुसूदन ने महर्षियों से कहा आपलोगों ने जैसा कहा है वैसा ही होगा।

इसके पश्चात् ऋषिगण अपने अपने आश्रम चले गए और फिर अगले दिन सवेरा होते ही जब साम्ब ने उस शाप जनित भयंकर मूसल को जन्म दिया तब यदुवंशियों ने उसे ले जाकर राजा उग्रसेन को दे दिया। उसे देखते ही राजा के मन में विषाद छा गया। उन्होंने उस मूसल को कुटवा दिया अर्थात अत्यंत महीन चूर्ण करा दिया। फिर राजा की आज्ञा से उनके सेवकों ने उस लोहचूर्ण को समुद्र में फेंक दिया। उसके पश्चात्  उग्रसेन ने  नगर में यह घोषणा करा दी कि आज से द्वारका के कोई भी नगरवासी मदिरा न तैयार करे। जो मनुष्य कहीं भी छिपकर कोई भी नशीली पिने की वस्तु तैयार करेगा वह स्वंय अपराध कर के जीते-जी अपने भाई-बंधुओं सहित शूली पर चढ़ा दिया जायेगा। उसके बाद सब लोगों ने राजा के भय से यह नियम बना लिया कि आज से न तो मदिरा बनाना है और न पीना है।

इस प्रकार द्वारकावासी अपने ऊपर आनेवाले संकट का निवारण करने के लिए भांति-भांति के प्रयत्न करने लगे। लेकिन कहते हैं ना की विधि के विधान को कोई नहीं टाल सकता यही बात द्वारकावासियों के साथ भी हुई भगवान कृष्ण भी विधि के विधान को नहीं टाल सके।  मूसल के जन्म के पश्चात् द्वारका में प्रतिदिन अनेक बार भयंकर आंधी उठने लगी ,चूहे इतने बढ़ गए थे कि उनकी संख्या मनुष्यों से ज्यादा हो गयी वे मिटटी के बर्तनो में छेद कर देते तथा रात में सोये हुए मनुष्यों के केश और नख कुतरकर खा जाय करते। सरस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की बोली बोलने लगे। गौओं के पेट से गदहे,खच्चरियों के पेट से हाथी,कुत्तियों  के पेट से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। धीरे धीरे द्वारकावासी  ब्राह्मणो,देवताओं और पितरों से भी द्वेष करने  लगे। इतना ही नहीं वे गुरुजनो का भी अपमान करने लगे। पत्नियां पतियों को और पति अपनी पत्नियों को धोखा देने लगे। अच्छी तरह रसोइ तैयार कर दी जाती थी उन्हें परोसकर जब लोग भोजन के लिए बैठते थे तब उनमे हजारों कीड़े दिखायी देने लगते थे। इस तरह काल का उलट फेर हुआ देख भगवान श्रीकृष्ण ने सब लोगों से कहा -वीरों महाभारत युद्ध के समय जैसा योग था वैसा ही योग आज भी है। यह हम सब लोगों के विनाश का सूचक है। बंधु-बांधवों के मारे जाने पर पुत्र शोक से संतप्त हुई गान्धारी देवी ने व्यथित होकर जो शाप दिया था उसके सफल होने का समय आ गया है। फिर श्री कृष्ण ने  यदुवंशियों को तीर्थयात्रा के लिये आज्ञा दी। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से द्वारकापुरी के सभी पुरुष प्रभास क्षेत्र में आकर निवास करने लगे।

फिर प्रभास क्षेत्र में यादवों का महापान आरम्भ हुआ। श्री कृष्ण के सामने ही कृत वर्मा सहित सात्यकि बभ्रु आदि पिने लगे। कुछ देर बाद पीते-पीते सात्यकि मद से उन्मत हो उठे और कृतवर्मा का उपहास तथा अपमान करते हुए  बोले कृतवर्मा  तेरे जैसा दूसरा कौन ऐसा क्षत्रिय होगा जो अपने ऊपर आघात न होते हुए भी रात में मुर्दों के समान अचेत पड़े हुए मनुष्यों की हत्या करेगा। खुद को महारथी कहने वाले तुम तो महाकयर निकले। सात्यकि के मुख से जिकले इन अपमानजनक बातों का  प्रद्युम्न भी अनुमोदन किया। यह सुनकर कृतवर्मा अत्यंत कुपित हो उठा और सात्यकि का अपमान करता हुआ बोला – अरे मुझे कायर कहने वाले क्या तम्हे याद नहीं की जब युद्ध में भूरिश्रवा की बाँहें कट गयी थी और वे पृथ्वी पर बैठ गए थे उस अवस्था में तूने उनकी क्रूरतापूर्ण हत्या क्यों की थी  ? और खुद को वीर समझते हो। कृतवर्मा की यह बात सुनकर श्री कृष्ण को क्रोध आ गया यह देख सात्यकि ने मधुसूदन को सत्राजित की कथा कह सुनायी। उसने बताया की कृतवर्मा ने ही मणि के  लिए सत्राजित का वध करवाया था।

फिर सात्यकि ने श्रीकृष्ण के पास से तलवार उठाकर कृतवर्मा का सिर धड़ से अलग कर दिया। तत्पश्चात वो दूसरे लोगों का भी वध करने लगा। यह देख भगवान श्री कृष्ण उसे रोकने के लिये दौड़े।यह देख कई वीरों ने वीरों ने सात्यकि को चारों ओर से घेर लियाऔर सात्यकि पर आघात करने लगे। जब सात्यकि इस प्रकार मारे जाने लगे तब क्रोध में भरे हुए प्रद्युम्न उन्हें संकट से बचाने के लिये स्वंय उनके और आक्रमणकारियों के बीच कूद पड़े। फिर दोनों मिलकर विरोधियों का सामना करने लगे। परन्तु विपक्षियों की संख्या बहुत अधिक थी इसलिये वे दोनों श्री कृष्ण के देखते-देखते उनके हाथ से मार डाले गये। सात्यकि तथा अपने पुत्र को मारा गया देख श्री कृष्ण क्रोध में आकर एक मुट्ठी एरका उखाड़ ली। उनके हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गयी। फिर तो जो-जो सामने आये उन सबको श्रीकृष्ण ने उसी से मार गिराया। दर्शकों आगे बढ़ने से पहले बता दूँ की एरका घास मूसल के उसी चूर्ण से जन्म था जिसे राजा ने समुद्र किनारे फिकवा दिया था।

फिर काल की प्रेरणा से यदुवंशियों ने उन्ही मूसलों से एक दूसरे को मारना आरम्भ किया। जो कोई भी क्रोध में आकर एरका नामक वह घास अपने हाथ में लेता उसी के हाथ में वह वज्र बन जाती थी। उस के बाद उस मूसल से पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मार डाला। कालचक्र के इस परिवर्तन को जानते हुए श्री कृष्ण वहां चुपचाप सब कुछ देखते रहे और मूसल का सहारा लेकर खड़े रहे। श्री कृष्ण ने जब देखा की उनका पुत्र साम्ब और पोता अनिरुद्ध भी मारा गया तब उनकी क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो उठी। फिर उन्होंने उस समय शेष बचे हुए समस्त यादवों का संहार कर डाला।

उसके बाद दारुक,बभ्रु और श्री कृष्ण तीनो ही बलरामजी के चरणचिन्ह देखते हुए वहां से चल दिये। थोड़ी ही देर बाद उन्होंने अनंत पराक्रमी बलरामजी को एक वृक्ष के निचे विराजमान देखा जो एकांत में बैठकर धयान कर रहे थे। फिर वहां पहुँच कर कृष्ण ने तत्काल दारुक को आज्ञा दी कि तुम शीघ्र ही कुरुदेश की राजधानी हस्तिनापुर में जाकर अर्जुन को यादवों के इस महासंहार का सारा समाचार कह सुनाओ। ब्राह्मणो तथा माता गांधारी के शाप से यदुवंशियों की मृत्यु का समाचार पाकर अर्जुन शीघ्र द्वारका चले आवें। श्रीकृष्ण के इस प्रकार आज्ञा देने पर दारुक रथ पर सवार हो तत्काल कुरुदेश को चला गया। वह भी महान शोक से अचेत सा हो रहा था।

उधर दारुक के चले जाने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने निकट खड़े हुए बभ्रु से कहा आप स्त्रियों की रक्षा के लिये शीघ्र ही द्वारका को चले जाइये। कहीं ऐसा न हो कि लुटेरे धन की लालच से उनकी हत्या कर दे । श्री कृष्ण की आज्ञा पाकर बभ्रु वहां से चलने को हुए  की तभी ब्राह्मणो के शाप के प्रभाव से उत्पन्न हुआ एक महान दुर्धर्ष मुसल किसी व्याध के बाण से लगा हुआ सहसा उसके ऊपर आकर गिरा। उसने तुरंत ही उसके प्राण ले लिए। बभ्रु को मारा गया देख श्री कृष्ण ने अपने भाई बलराम जी से कहा दाऊ आप यहीं रहकर मेरी प्रतीक्षा करें। जब तक मैं द्वारका जाकर स्त्रियों को संरक्षण में सौंप आता हूँ। इतना  कहकर श्री कृष्ण द्वारिका पूरी चले गए और वहां अपने पिता वासुदेव जी से बोले-तात ! आप अर्जुन के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए हमारे कुल की समस्त स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय दाऊ वन में मेरी राह देख रहे हैं।

मैंने इस समय यदुवंशियों का विनाश देखा है और अब मैं उन यादव वीरों के बिना इस पूरी को देखने में भी असमर्थ हूँ। इसलिए अब मैं वन में जाकर दाऊ भैया के साथ तपस्या करूँगा। ऐसा कहकर उन्होंने अपने पिता के चरणों को स्पर्श किया। फिर वे वहां से तुरंत चल दिए। किन्तु जब वो राजमहल से बाहर निकले तो उन्हें नगर की स्त्रियों और बालकों के रोने का महान आर्तनाद सुनायी पड़ा। यह सुनकर श्री कृष्ण उनके पास  आये और उन्हें सांत्वना देते हुए बोले देखिये नरश्रेष्ठ अर्जुन शीघ्र ही इस नगर में आनेवाले हैं। वे आप सभी को संकट से बचाएंगे। इतना कहकर भगवान श्री वन की ओर  चल दिए । वहां जाकर श्री कृष्ण ने ने देखा की  बलराम जी योगयुक्त हो समाधि लगाये बैठे थे। और उनके मुख से एक श्वेत वर्ण का विशालकाय सर्प को निकल रहा है। और उसी क्षण बलराम जी  अपने पूर्व शरीर को त्यागकर नाग रूप में प्रकट हो गए । उसमे सहस्त्रों मस्तक थे। उसका विशाल शरीर पर्वत के समान विस्तार सा जान पड़ता था। फिर उन्होंने भगवान कृष्ण को प्रणाम  किया और समुद्र के रास्ते परमधाम को लौट गए।

उधर बलराम जी के परमधाम जाने के बाद भगवान श्री कृष्ण महायोग का आश्रय ले पृथ्वी पर लेट गए। उसी समय जरा नामक एक व्याध मृगों को मार ले जाने की इच्छा से उस स्थान पर आया । उस समय श्री कृष्ण योगयुक्त होकर सो रहे थे। मृगों में आसक्त हुए उस व्याध ने श्री कृष्ण को भी मृग ही समझा और बाण मारकर उनके पैर के तलवे में घाव कर दिया। फिर उस मृग को पकड़ने के लिए जब वह निकट आया तब योग में स्थित श्री कृष्ण पर उसकी दृष्टि पड़ी अब तो जरा अपने को अपराधी मानकर मन-ही-मन बहुत डर गया। उसने भगवान श्री कृष्ण के दोनों पैर पकड़ लिए। तब महात्मा श्री कृष्ण ने उसे आश्वाशन दिया और अपना देह त्यागकर वैकुण्ठ धाम को चले गए।

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