संतोषी माता व्रत , कथा और पूजन विधी 2022
संतोषी माता 2022 व्रत, कथा और पूजन विधी
संतोषी माता 2022 व्रत, कथा और पूजन विधी
संतोषी माता को सभी इच्छाओं को पूरा करके संतोष प्रदान करने वाली देवी माँ के रूप में जाना जाता हैं. उनके नाम का भी यही अर्थ हैं. यह विघ्नहर्ता श्री गणेश की बेटी हैं, जो सभी दुखों और परेशानियों को हर लेती हैं, भक्तों के दुर्भाग्य को दूर करती हैं और उन्हें सुख एवं समृद्धि से भर देती हैं. इनका पूजन अर्चन सामान्यतः उत्तरी भारत की महिलाओं द्वारा अधिक किया जाता हैं. ऐसा माना जाता है कि लगातार 16 शुक्रवार माता का व्रत रखने और विधी – विधान से अर्चना करने से माँ संतोषी प्रसन्न होती हैं और परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का आशीर्वाद प्रदान करती हैं.
माँ संतोषी को माँ दुर्गा के सबसे शांत, कोमल और विशुद्ध रुपों में से एक माना जाता हैं.माँ संतोषी कमल के फूल पर विराजमान हैं, जो इस बात का प्रतीक हैं, कि भले ही यह संसार स्वार्थियों और कठोर लोगों से भरा हो, भ्रष्टाचार व्याप्त हो, परन्तु माँ संतोषी अपने भक्तों के ह्रदय में हमेशा अपने शांत और सौम्य रूप में विराजमान रहती हैं. वह क्षीर सागर [दूध का सागर] में कमल के फूल पर वास करती हैं, जो उनके निर्मल स्वरुप का ज्ञान कराता हैं और हमें यह ज्ञात कराता हैं, कि जिनके ह्रदय में कोई कपट नहीं हैं और माता के प्रति सच्ची श्रद्धा है, वहाँ माँ संतोषी निवास करती हैं.
सामान्यतः कहा जाता हैं कि अगर हम मीठा खाएँगे तो मीठा बोलेंगे भी, उसी तरह माँ संतोषी भी अपने भक्तों को खट्टी चीजों से दूर रहने अर्थात् बुरे कार्यों से दूर रहने को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाती हैं और उन्हें पूर्ण रूप से निर्मलता, सुख और संतोष प्रदान करती हैं.
माँ संतोषी के जन्म की कथा
कहा जाता हैं कि एक बार रक्षाबंधन के त्यौहार पर भगवान श्री गणेश अपनी बहन के साथ यह त्यौहार मना रहे थे, तभी उनके पुत्रों [शुभ और लाभ] ने भी इस त्यौहार को मनाने की बात कही और अपने पिता से एक बहन की मांग की. भगवान श्री गणेश ने पहले तो मना कर दिया, परन्तु अपनी बहन, पत्नियों रिद्धि और सिद्धि और पुत्रों के बार- बार कहने पर उन्होंने एक कन्या प्रकट की और इस कन्या का नाम संतोषी रखा और इस प्रकार माँ संतोषी का जन्म हुआ.
माँ संतोषी के स्वरुप का वर्णन
माँ संतोषी हमे केवल निर्मलता और शांति ही प्रदान नहीं करती, बल्कि अपने सभी भक्तों की बुरी बलाओं से रक्षा भी करती हैं. उनके बाएं हाथ में जो तलवार और दायें हाथ में जो त्रिशूल हैं, वह इसी बात का प्रतीक हैं कि माता के भक्त उनके संरक्षण में हैं. ऐसी मान्यता हैं कि माता के चार हाथ हैं. अपने भक्तो के लिए तो उनके दो ही हाथ प्रकट रूप में हैं, परन्तु अन्य दो हाथ उन बुरी शक्तियों के लिए हैं, जो सच्चाई और अच्छाई के रास्ते में रूकावट उत्पन्न करते हैं. माँ संतोषी का रूप बहुत ही शांत, सौम्य और सुन्दर हैं, जो भक्तों को मन्त्र मुग्ध कर देता हैं.
पूजा के लिए आवश्यक सामग्री
- माँ संतोषी का फोटो,
- कलश,
- पान के पत्ते
- फूल,
- प्रसाद के रूप में चना और गुड़,
- आरती के लिए कपूर
- अगरबत्ती,
- दीपक,
- हल्दी
- कुमकुम,
- कलश स्थापना के लिए एक नारियल [पूजा पूरी होने तक यही नारियल उपयोग किया जाएगा],
- माता की फोटो स्थापना के लिए एक लकड़ी का स्टूल,
- पीले चावल (चावल जिसमे हल्दी मिली हुई हो)
माता संतोषी की पूजा के रीति – रिवाज़
- माँ संतोषी की आराधना विशेष रूप से शुक्रवार के दिन की जाती हैं.
- इनकी अर्चना के लिए लगातार 16 शुक्रवार तक व्रत रखा जाता हैं और पूजा की जाती हैं.
- साथ ही खट्टी चीजों का प्रयोग वर्जित हैं और अंत में उद्यापन किया जाता हैं. ऐसा करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती हैं.
- शुक्रवार के दिन प्रातः सिर से स्नान आदि करके माता का फोटो एक स्वच्छ देव स्थान पर रखते हैं और एक छोटे कलश की स्थापना करते हैं.
- अब माता का फोटो पुष्प इत्यादि से सुसज्जित करते हैं.
- अब चना [जो कम–से –कम 6 घंटों तक पानी में भीगा हो] अथवा बेंगल ग्राम के साथ गुड़ और केला प्रसाद के रूप में रखते हैं.
- अब फोटो के सामने दिया जलाते हैं, मन्त्र का उच्चारण करते हैं और माता की आरती उतारते हैं और फिर प्रसाद ग्रहण किया जाता हैं.
- आप चाहे तो पूरा दिन उपवास रखें अथवा दिन में एक बार भोजन ग्रहण करें. परन्तु यह हमेशा ध्यान रखें कि आपको इस पूरे दिन में किसी भी खट्टे खाद्य पदार्थ का सेवन नहीं करना हैं.
- आपको यह सम्पूर्ण प्रक्रिया 16 शुक्रवारों तक करनी हैं और 16 सप्ताह बाद इसका उद्यापन करते हैं, जिसमे आप कम – से – कम 8 बच्चों को भोजन कराते हैं. परन्तु यहाँ भी ये ध्यान रखें कि उन्हें कोई भी खट्टे पदार्थ खाने को न दिए जाएँ और न ही आप उन्हें धन दें, जिसका उपयोग वे खट्टा पदार्थ खाने में कर सकते हैं.
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