जब श्री कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोड़ी हो जाने का श्राप दिया था!

मित्रों आप सभी ने भगवान कृष्ण से जुडी कई कथाएं सुनी होगी और ये भी जानते होंगे की उन्होंने इस अवतार में कई पापियों का वध कर उनका उद्धार किया था वहीँ कई लोगों को वरदान देकर कृतार्थ भी किया था । इसके अलावा आप ये भी जानते होंगे कि महाभारत युद्ध के बाद सोते हुए पांडव पुत्रों का वध करने और उतरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र छोड़ने के अपराध के लिए श्री कृष्ण ने अश्व्थामा को श्रीति के अंत तक भटकते रहने का श्राप दिया था |

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जब श्री कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोड़ी हो जाने का श्राप दिया था!

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लेकिन आज हम आपको भगवान श्री कृष्ण के द्वारा दिए गए एक ऐसे श्राप की कथा बताने जा रहा हूँ जिसमे श्री कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोड़ी हो जाने का श्राप दिया था

अगर आपने इस प्रसंग के बारे में नहीं सुना , तो आइये आज मिलकर जानते हैं कि श्री कृष्ण के पुत्र ने ऐसा कौन सा अधर्म किय था जिसकी वजह से उन्हें भगवान श्री कृष्ण द्वारा ऐसा श्राप मिला |

भविष्य पुराण,स्कन्द पुराण और वराह पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि श्री कृष्ण ने स्वंय अपने पुत्र सांबा को कोढ़ी होने का श्राप दिया था। 

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के आठ रानियां थी जिनमे से एक निषादराज जामवंत की पुत्री जामवंती थी। जामवंत उन गिने चुने पौराणिक पात्रों में से एक हैं जो रामायण और महाभारत दोनों काल में मौजूद थे।

पुराणों के अनुसार एक बार एक दिव्य मणि को  हासिल करने के लिए भगवान श्री कृष्ण और जामवंत में 28 दिनों तक महाभयंकर युद्ध चला था।और अंत में  युद्ध के दौरान जब जामवंत ने कृष्ण के विष्णु स्वरुप को पहचान लिया तब उन्होंने मणि समेत अपनी पुत्री जामवंती का हाथ भी उन्हें सौंप दिया। कृष्ण और जामवंती के पुत्र का ही नाम सांबा था जिसे संस्कृत में सम्भ कहा गया । 

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संभा का विवाह दुर्यो धन की पूर्ति लक्ष्मणा के संग हुआ था परन्तु देखने में वह इतना सुन्दर था कि कृष्ण की कई छोटी रानियां भी उसके प्रति आकृष्ट रहती थी। सांबा की सुंदरता की वजह से एक दिन श्री कृष्ण की एक रानी ने लक्ष्माना का रूप धारण कर सांबा को अपने आलिंगन में भर लिया। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्या दृष्टि से अपने पुत्र और रानी के इस कृत्या को जान लिया और श्री कृष्ण इस पर क्रोधित हो गए सुबह सुबह के पहर उन्होंने संभा को अपने कक्ष में भुलवाया और क्रोध के वश में आकर उन्होने अपने ही पुत्र को कोढ़ी हो जाने और मृत्यु के पश्चात् डाकुओं द्वारा उसकी पत्नियों को अपहरण हो जाने का श्राप दिया। पिता के द्वारा दिए गए श्राप से सामबा चिंतित हो उठा और उसने भगवान श्री कृष्ण से क्षमा मंगाते हुए कहा पिता श्री इसमें मेरी कोई गलती नहीं है 

रात्रि के अँधेरे में मैं उन्हें पहचान नहीं पाया और उन्हें अपनी पत्नी समझकर ही मैंने उनके संग आलिंगन किया था । यह सुनकर श्री कृष्ण बोले की पुत्र श्राप तो वापस नहीं लिया जा सकता है परन्तु इस श्राप से मुक्त होने का एक मार्ग अवश्य है. 

तब सांबा बोला पिता जी कृपया कर मुझे वह मार्ग बताइये। तब श्री कृष्ण सांबा से बोले तुम तत्काल महर्षि कटक से जाकर मिलो वही तुम्हे इस श्राप से मुक्त होने का मार्ग बताएँगे। इसके बाद सांबा वहां से महर्षि कटक से मिलाने चल पड़ा। 

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फिर कुछ दिन बाद महर्षि कटक के वहाँ पहुंचकर सांबा ने  उनसे श्री कृष्ण द्वारा दिए गए श्राप से मूक होने का मार्ग पुछा। तब महर्षि कटक ने कोढ़ से मुक्ति पाने हेतु सूर्य देव की घोर आराधना करने के लिए कहा। तब सांबा ने चंद्रभागा नदी के किनारे मित्रवन में सूर्य देव का मंदिर बनवाया और 12 वर्षों तक उन्होंने सूर्य देव की कड़ी तपस्या की। 

कहते हैं कि सूर्य देव ने सांबा की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे कोढ़ से मुक्ति पाने के लिए चंद्रभागा नदी में स्नान करने को कहा। 

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तभी से आज तक  चंद्रभागा नदी को कोढ़ ठीक करने वाली नदी के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इस नदी में स्नान करने वाले व्यक्ति का कोढ़ जल्दी ठीक हो जाता है।और साम्बा द्वारा बनवाया गया वह मंदिर आज पकिस्तान के मुल्तान शहर में स्थित है जिस आदित्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 

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